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कार्तिक स्नान

अयोध्या में कार्तिक मेले और स्नान का बड़ा महत्व है. गुलाबी सर्दी के बीच यहाँ श्रद्धालु सरयू की पावन जल धारा में स्नान करके मंदिरों के दर्शन करते हैं. अयोध्या में कार्तिक कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से कार्तिक शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तक राम माह का कल्पवास रहता है.  इस अवसर पर भव्य मेले का आयोजन होता है.

रामनवमी

चैत्र मास  के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में सुर्यवंश में कौशल्या की कोख से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का जन्म हुआ था इसलिए यह तिथि राम नवमी के नाम से जानी जाती है. हिन्दुओं में यह दिन पुण्य माना जाता है.अयोध्या वासी  राम महोत्सव में सराबोर रहते हैं. इस दिन पुण्य सलिला सरयू में लाखों लोग स्नान करके पुण्य लाभ कमाते हैं. राम भक्तों के लिए तो यह पर्व अत्यंत महत्पूर्ण है, देश के सुदूर अंचलों से यात्री श्री रामचंद्र जी के दर्शन और सरयू में स्नान के लिए आते हैं.

श्रावण मेला

यह मेला देवताओं की चंचल भावना परिलक्षित करता है। श्रावण के दूसरे पखवारे के तीसरे दिन, देवताओं की मूर्ति (विशेष रूप से राम, लक्ष्मण और सीता ) को मंदिरों में झूलों में रखा जाता है।  जहां मूर्तियों को पेड़ की शाखाओं में बने झूलों में झुलाया जाता है। बाद में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को मंदिरों में वापस लाया जाता है। मेला श्रावण के महीने के अंत तक रहता है।

परिक्रमा

अयोध्या में परिक्रमा का बड़ा महत्व है. ऐसी मान्यता है कि जो भी तन मन से अयोध्या की अपनी क्षमता के अनुसार परिक्रमा करता है. उसकी मनोकामना पूर्ण होती है. इन पारिक्रमाओं में विभिन्न धर्मों के लोग भी हिस्सा लेता हैं. यहाँ चार प्रकार की परिक्रमा अत्यंत प्रचिलित हैं. जो निम्न हैं.

अन्तरगढ़ी परिक्रमा

यह परिक्रमा अयोध्या के मुख्य पूजा स्थलों की परिक्रमा है. यह परिक्रमा सरयू में स्नान के साथ आरम्भ  होती है और सामान्य तौर पर 24 घंटे में समाप्त हो जाती है. यह परिक्रमा स्वर्गद्वार घाट नागेश्वर मंदिर से आरम्भ होती है और रामघाट, सीताकुण्ड, मणि पर्वत और ब्रम्ह कुण्ड से होते हुए कनक भवन पर समाप्त होती है . अयोध्या में हिन्दू तीर्थयात्रियों द्वारा परिक्रमा की जाती है। यह अलग-अलग अवधि की होती है। सबसे कम समय की परिक्रमा अंतरग्राही परिक्रमा है, जो एक दिन में समाप्त हो जाती है। पवित्र सरयू में डुबकी लेने के बाद भक्तगण नागेश्वरनाथ मंदिर से परिक्रमा शुरू करते हैं और अंत में कनक भवन पर समाप्त करते हैं। वे राम घाट, सीता कुंड, मणि पर्वत और ब्रह्मा कुंड से होकर गुजरते हैं। इसी प्रकार से पंचकोसी परिक्रमा में 10 मील की दूरी तय की जाती है। इस परिक्रमा के मार्ग पर नया घाट, रामघाट, सरयू बाग, होलकर-का-पुरा, दशरथ कुंड, जोगिना, रानोपाली व महेताबाग मुख्य रूप से शामिल हैं। भक्तगण परिक्रमा के मार्ग पर पड़ने वाले मंदिरों के दर्शन भी करते हैं। चौदह कोसी परिक्रमा में 28 मील की दूरी तय की जाती है। यह वर्ष में केवल एक बार अक्षय नवमी के अवसर पर आयोजित की जाती है जो 24 घंटे में पूरी होती है।

पंच कोसी परिक्रमा :

यह परिक्रमा करीबन 10 मील की होती है. कार्तिक माह की शुक्लपक्ष की एकादशी को अयोध्या में पंचकोसी परिक्रमा की जाती है. यह परिक्रमा पांच कोस के परिवृत्त में की जाती है. कार्तिक शुक्ल एकादशी को प्रातः सरयू में स्नान व परिक्रमा मार्ग पर दण्डवत पूजा तथा भजन कीर्तन व पूजन के साथ परिक्रमा पूरी की जाती है. पंच कोसी परिवृत्त में पड़ने वाले धार्मिक स्थलों में शेषावतार मंदिर, दिव्य्काल मंदिर, तुलसी घाट, जालपा मंदिर, मानस भवन, दशरथ कुण्ड, कंचन भवन व लक्ष्मण घाट आदि हैं. श्रध्हालू इन मंदिरों में पूजन अर्चन करते हुए परिक्रमा पूरी करते हैं.

चौदह कोसी परिक्रमा :

कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की नवमी को परिक्रमा का आरम्भ  होता है. इस दिन को अक्षय नवमी भी कहा जाता है. अक्षय नवमी को चौदह को कोस (लगभग 45 किलोमीटर के परिवृत्त में चौदह कोसी परिक्रमा की जाती है. यह परिक्रमा सरयू में स्नान पूजन से आरम्भ होकर 24 घंटे में समाप्त होती है. परिक्रमा अवधि में श्रद्धालु नंगे पैर चलते हुए परिक्रमा पथ के धार्मिक स्थलों का दर्शन करते हैं इसके आलावा भजन कीर्तन के साथ परिक्रमा को पूर्ण करते हैं.शास्त्रों में यह प्रदक्षिणा अधिक महत्व वाली है. यह परिक्रमा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों फल देने वाली है.

चौरासी कोसी परिक्रमा :

यह परिक्रमा प्रतिवर्ष बैसाख कृष्ण प्रतिपदा को मख क्षेत्र से आरम्भ होती है. सरयू तट के पार अयोध्या से लगभग 30 किलोमीटर दूर मखौदा गाँव है जिसे मख भी कहा जाता है. यह मान्यता के अनुसार के राजा श्री राम की राजधानी का विस्तार 84 कोस तक था. इस परिक्रमा को करने से मनुष्य की सभी कामनाओं की पूर्ती के साथ मोक्ष की प्राप्ति होती है. चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग अवध क्षेत्र के छह जनपद आते हैं. फैजाबाद, बस्ती, गोंडा, आंबेडकर नगर, बाराबंकी व बहराइच जिले के क्षेत्र इस  परिक्रमा के अंतर्गत आते हैं. यह यात्रा मखौदा (बस्ती) से शुरू होकर, रामरेखा, अयोध्या, ऋषि शृंगी, गोसाईगंज, तारुण, बीकापुर, अस्तिकन, जन्मेजय कुण्ड, रुदौली, टिकैतनगर (बाराबंकी), जखलरोड़ ( बहराइच ), परसपुर, पासका, उमरी, तारब गंज, सिकन्दरपुर (गोंडा) से होते हुए पुनः मखौडा में जाकर समाप्त होती है.परिक्रमा करने वाले श्रद्धालु चौरासी कोस की दूरी पैदल, ट्रैक्टर व बस द्वारा की जाती है.

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