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हनुमान गढ़ी

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब श्री राम अयोध्या नगरी छोड़ परम धाम को जाने लगे, तब उन्होंने अपने परम भक्त हनुमान को अपना राज काज सौंप दिया. तभी से पवन पुत्र  हनुमान अयोध्या के राजा कहलाये जान लगे. इसलिए अयोध्या आकर भगवान राम के दर्शन से पहले भक्त हनुमान जी के दर्शन करते हैं। कहा जाता है हनुमान जी आज भी रामजन्मभूमि और रामकोट की रक्षा करते हैं । हनुमानगढ़ी अयोध्या नगरी के प्रमुख स्थानों में से एक है. यह मंदिर राजद्वार के सामने ऊंचे टीले पर स्थित है। जहां आज भी छोटी दीपावली के दिन आधी रात को संकटमोचन का जन्म दिवस मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि पावन नगरी अयोध्या में सरयू नदी में पाप धोने से पहले लोगों को भगवान हनुमान से आज्ञा लेनी होती है।   मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग 76 सीढि़यां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर के मुख्य भाग में बाल हनुमान के साथ अंजनी माता की विग्रह स्थापित है। श्रद्धालुओं का मानना है कि इस मंदिर में आने से उनकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।  लाल हरे रंगों से सजी दीवालों पर पड़ती सुबह शाम की खिलती धूप मंदिर प्रांगढ को और खूबसूरत बनाती है. मंदिर में प्रसाद के रूप में बेसन के लड्डू प्रमुख रूप से चढ़ाये जाते हैं. हनुमान जयंती व अयोध्या में आयोजित होने वाले विभिन्न मेलों के दौरान मंदिर में शर्द्धालुओं का तांता लगा रहता है.

विगृह :

मन्दिर के गर्भगृह में हनुमान जी राजा रूप में विराजमान हैं. उनके पीछे भगवान राम का दरबार है, जिसमें भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता के विगृह हैं.

भोग / पूजा :

मन्दिर में हनुमान जी को नित्य देशी घी की पूड़ी, सब्जी, का भोग लगता है. मंगलवार शनिवार को हलुआ का प्रसाद भोग में चढ़ता है.

नागेश्वर नाथ मन्दिर

नागेश्वर नाथ मन्दिर

स्वर्ग द्वारे नरः स्नात्वा दृष्टवा नागेश्वरम शिवम् ! पूजयित्वा च विधिंवत सर्वान कामान्वाप्न्युयात !!

सरयू नदी किनारे स्वर्गद्वार पर स्थित श्री नागेश्वर नाथ मन्दिर बाहर से देखने में बेहद साधारण लगता है, पर मान्यता और ऐतिहासिकता के आधार पर यह मन्दिर विशेष महत्व रखता है. यह मन्दिर राम की पैड़ी पर है, भारत वर्ष के 108 ज्योतिर्लिंगों में से यह एक ज्योतिर्लिंग है. ऐसा माना जाता है कि यह मन्दिर लाखों वर्ष पहले भगवान राम के कनिष्ठ पुत्र श्री कुश के द्वारा स्थापित किया गया था. मन्दिर के महंत के अनुसार  जिस समय भगवान राम अपने निज धाम को जाने लगे तो अयोध्या का राज्य अनजनी नंदन एवं चिरंजीव कुश को कुशावर्त (कुशावती नगरी) क्षेत्र का राज्य दे गए थे. अपने राज्य का संचालन करते हुए श्री कुश  जी को अयोध्या दर्शन की इच्छा जाग्रत हुयी. इस विचार से वे अयोध्या आये, दर्शन के पश्चात स्वर्गद्वार तीर्थ में स्नान करने लगे. तभी उनके हाथ का स्वर्ण कंगन सरयू जी के जल में गिर गया. स्वर्ण कंगन को नाग कन्या कुमुदनी ने पाया, और वह उसे लेकर पाताल लोक चली गयीं. जब खोज करने पर भी कुश जी को कंगन नहीं मिला तो वह क्रोधित हुए, उन्होंने पाताल लोक का नाश करने का संकल्प ले लिया. कुश ने रौद्र रूप को देख  कुमुद भयभीत हुयी और भगवान शंकर की प्रार्थना करने लगीं.  भगवान शंकर ने कुश के क्रोध से बचाने के लिए   दर्शन दिए. भगवान शंकर को देख कर कुश जी का क्रोध ख़त्म हो गया. उन्होंने धनुष बाण रख दिया एवं साष्टांग प्रणाम कर उनका षोडषो पूजन किया और कहा कि नाग की प्रार्थना पर प्रसन्न होकर आप यहाँ प्रकट हुए इसलिए इस स्थान की नागेश्वर नाथ के नाम से प्रसिद्धि हो. यही स्वर्गद्वार पवित्र तीर्थ में नागराज के संरक्ष्नार्थ श्री कैस्लाश नाथ भगवान शंकर जी आये इसी से इनका नाम नागेश्वर नाथ पड़ा. स्वर्गद्वार स्थित इस मन्दिर के उत्तर पूर्व एवं पश्चिम में 3 विशाल दरवाजे हैं, गर्भगृह में नागों से वेष्टित प्रधान शिवलिंग है. इसकी विशेषता है कि यह अर्ध्य गोलाकार है, इसके सम्मुख मातेश्वरी जगदम्बा माँ के दिव्य दर्शन है. गर्भगृह के बाहर मन्दिर  प्रांगण में दक्षिण भिसुण्डी श्री गणेश जी हैं एवं नन्दी  के तीन श्री विग्रह सुण्डी के सम्मुख हैं, इसके अतिरिक्त बगल में राम मन्दिर एवं नन्दीकेश्वर के दर्शन हैं. मन्दिर के बाहर स्तंभों पर गणों एवं देवी देवताओं के विग्रह हैं जो मूर्तिकला की द्रष्टि से बड़े ही महत्वपूर्ण और दर्शनीय हैं.

पूजा विधि :

मन्दिर में शंख, घंटा और डमरू के नाद के बीच आरती होती है. यह  प्रातः 4 बजे से रात्री 9 बजे तक भक्तों के दर्शन के लिए खुला रहता है. प्रातः 4 बजे मंगला आरती से पूजन शुरू होता है, मध्यान्ह में राजभोग आरती सायं श्रृंगार आरती व शयन आरती के कार्यक्रम होते हैं. यहाँ विशेष अवसरों पर 1051 बत्ती की आरती का भी प्रावधान है.

कालेराम मन्दिर

काले राम मंदिर राम की पैड़ी के पास स्थित नागेश्वर नाथ मंदिर के ठीक पीछे है, यह मन्दिर भी प्राचीन मन्दिरों में गिना जाता है. मन्दिर के महंत के अनुसार के राजा दर्शन सिंह के समय लगभग  1748 में भारत के महाराष्ट्रिय ब्राह्ममण योगी पं0 श्री नरसिंह राव मोघे को  एक स्वप्न में हुए आदेश के अनुसार श्रीरामचन्द्र जन्मभूमि के पंचायतन विग्रह की प्राप्ति ब्राह्मण योगी को सहस्त्रधारा लक्ष्मण घाट पर स्नान करते समय सरयू नदी में हुई. जिसकी स्थापना  उन्होने सुप्रसिद्ध  नागेश्वरनाथ के सानिध्य की जो आज श्री कालेराम मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ हजारों रामभक्त नित्य दर्शन एवं उपासना कर अपनी मनौतियों को पूर्ण करते है  इस मन्दिर की विशेषता ये है कि यहाँ सम्पूर्ण श्रीरामपंचायतन एक ही शालिग्राम शिला में है जो अन्यत्र दुलर्भ है

विगृह :

मन्दिर के गर्भ गृह में राम जी उनके वामांग में किशोरी जी, उनके वमांग में भरत लाल जी, राम जी के दक्षिण लक्ष्मण जी, उनके दक्षिण शत्रुघ्न लाल जी श्री रामपंचायतन राज्य अभिषेक का दर्शन है श्री राम पंचायतन के ठीक सामने दक्षिणाभिमुख श्री हनुमान जी का विग्रह भी दुर्लभ है जो कि श्यामवर्ण में है ।   मन्दिर से सटा हुआ एक छोटा राम नाम का मन्दिर है जिसमें 15 करोड़ ‘‘ श्री राम जय राम जय जय राम ’’ त्रियोदशाक्षरी मंत्र जो आन्नद रामायण से प्रतिपादित है उसके साथ हस्तलिखित 4 वेद, 18 पुराण, 6 शास्त्र, तुलसीकृत, अध्यात्म, वाल्मिकी आन्नद एवं अन्यान्न रामायणों का संग्रह, गीता, 108 उपनिषद् एवं अन्य हिन्दु धर्म संस्कृति के ग्रंथ संग्रहित है जिसकी परिक्रमा से पृथ्वी परिक्रमा का लाभ प्राप्त होता है यह मन्दिर प्रातः 4.30 से 11.30 तक एवं सायंकाल 4.00 से 9.00 तक दर्शनार्थ खुला रहता है भगवान का नित्य दर्शन तो सर्वसुलभ है ही परन्तु श्री रामनवमी के दिन प्रभु श्री कालेराम भगवान के दर्शनों का विशेष महत्व है ।

छोटी देव काली जी का स्थान, अयोध्या जी

छोटी देव काली जी का स्थान 

मान्यता है कि छोटी  देवकाली की प्रतिष्ठा माता जानकी की ग्राम देवी या कुल देवी के रूप में हुयी. जगत जननी माँ सीता जी विवाहोपरांत अपने पितृ गृह जनकपुरी से जब  अयोध्या के लिए चलीं, तो अपनी कुल देवी जो कि  गौरी मंगला के रूप में थीं, अपने साथ ले आयीं. इसके पश्चात महाराज दशरथ जी ने अयोध्या स्थित सप्तसागर के ईशानकोण  पर एक मन्दिर बनवा दिया. लक्ष्मीस्वरूपा माता सीता जी नित्य निज निवास कनक भवन से आकर माँ  छोटी देवकाली का पूजन करती थीं.  ग्राम देवी या कुलदेवी की आराधना के फलस्वरूप ही सीता जी को उन्हें भगवान राम जैसा सुयोग्य वर मिला. उसी मान्यता की आस्था आज भी जीवित है. छोटी देवकाली के दर्शन मात्र को दूर दराज़ से नव वधुएँ यहाँ आज भी उत्साह से आती हैं और माँ का आशीर्वाद सुयोग्य वर के रूप में पाती हैं.  छोटी देवकाली मन्दिर के महत्व का उद्धरण स्कन्द पुराण और रुद्रयामल में मिलता है.  पौराणिक आख्यानों में अत्रि संहिता के मिथिला खंड में मिथिला की ग्राम देवी के रूप में उनका उल्लेख है । महर्षि वेदव्यास ने रुद्रयामल तंत्र व स्कंदपुराण में ईशानी देवी के नाम से छोटी देवकाली मंदिर का वर्णन किया है। स्कंदपुराण में ‘विदेह कुलदेवी च सर्वमंगलकारिणी श्लोक में इसका उल्लेख है। इस श्लोक में विस्तार से बताया कि इन सर्वमंगलकारिणी, स्कंदमाता, शिवप्रिया भवानी का पूजन करने से समस्त प्रकार के इष्ट पूरे होते हैं। रुद्रयामल तंत्र में श्री सीता द्वारा प्रतिदिन छोटी देवकाली मंदिर में पूजन का उल्लेख हैं। कई इतिहासकारों, दार्शनिकों और पर्यटकों ने भी इसकी महिमा का बखान अपने लेखों में किया है. यह मन्दिर फैजाबाद अयोध्या मार्ग पर हनुमान गढ़ी से आगे डाक खाने के पास गली में स्थित है.  मन्दिर की भीतरी दीवालों पर लगे शिलापटों पर माँ की आरती व चालीसा अंकित हैं जो इस मन्दिर की खूबसूरती को और बढ़ा देती हैं. मन्दिर परिसर में अन्य छोटे मन्दिर भी हैं. यह मन्दिर कनक भवन के ईशान कोण में स्थापित है. चैत्र नवरात्र, आषाढ़ नवरात्र, आश्विन नवरातोत्सव में यहाँ नित्य 1051 बत्ती की भव्य आरती का आयोजन होता है. इसके अलावा वसंत पंचमी, जानकी जन्मोत्सव, कार्तिक सुदी द्वितीया के अवसर पर सप्तसती पाठ, अखण्ड कीर्तन, कन्या बरुआ भोज, भंडारा आदि का विशेष आयोजन होता है.

विगृह :

मन्दिर के गर्भ गृह में शेर पर सवार माता देवकाली की सिन्दूरी वर्ण की विगृह मुख्य रूप से विराजमान हैं. मन्दिर परिसर के  परिक्रमा क्षेत्र में 8 देवियों के भी विभिन्न स्वरुप स्थापित हैं. जिससे एक ही जगह माता देवकाली समेत 9 देवियों का दर्शन लाभ मिलता है.

भोग/ पूजा विधि :

माता को बाल भोग के समय नित्य फल, मिष्ठान, मेवा का भोग लगाया जाता है. दोपहर और शाम को राजभोग का भोग लगाया जाता है. पंचोच्चार विधान से जल, सिन्दूर, अक्षत, पुष्प, माला, नैवेद्य आरती से पूजा अर्चना की जाती है,

आरती :

शीत काल में सुबह 6:30 बजे मंगला आरती के साथ मन्दिर के कपाट खुलते हैं, 11 बजे भोग आरती के पश्चात भोग लगाया जाता है, संध्या काल में 4 बजे बाल भोग आरती होती है, सायं 7:30 बजे आरती कर के 9 बजे मन्दिर के कपाट बन्द कर दिए जाते हैं. ग्रीष्म काल में प्रातः आधा घंटे पहले मन्दिर  के द्वार खुलते हैं और रात्री में आधा घंटे देर से बन्द होते हैं.

क्षीरेश्वर मन्दिर

क्षीरेश्वर मन्दिर अयोध्या के प्राचीन मन्दिरों में से एक है. इस मन्दिर में स्वयंभू शिवलिंग का प्राकट्य इस मन्दिर को विशेष बनाता है. मन्दिर के पुजारी के अनुसार मन्दिर के गर्भ गृह में स्वम्भू शिवलिंग, 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक उज्जैन के महाकालेश्वर में शिवलिंग के समान है.  क्षीरेश्वर मन्दिर अयोध्या फैजाबाद मार्ग पर श्री राम हॉस्पिटल के ठीक सामने स्थित है. मुख्य मार्ग पर स्थित होने के कारण मन्दिर के दर्शन सुगम हो जाते हैं. क्षीरेश्वर मन्दिर महादेव का मन्दिर है. ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त इस मन्दिर में स्थापित शिवलिंग की पूरे विधि विधान से पूजा करता है उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है. पौराणिक कथाओं के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पूर्वज मान्धाता के कोई पुत्र नहीं था. पुत्र प्राप्ति की कामना लेकर मान्धाता ने इस स्थान पर 11 वर्ष तक कामधेनु गाय के दूध से रुद्राभिषेक किया था. इस रुद्राभिषेक में क्षीर अर्थात दूध की इतनी मात्रा एकत्रित हुयी कि मन्दिर के निकट क्षीर सागर बन गया था. मन्दिर के आस पास का क्षेत्र आज भी क्षीरसागर के नाम से जाना जाता है. 11 वर्ष लगातार रुद्राभिषेक के बाद मान्धाता को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी. इसी मान्यता के आधार पर ऐसे दंपत्ति यहाँ आकर रुद्राभिषेक करते हैं, जिन्हें संतान सूख नहीं प्राप्त होता है.  एक और मान्यता के अनुसार कभी इस मन्दिर के समक्ष, दूर से कुबेर भी नित्य महादेव के दर्शन करते थे. कुबेर की नित्य आराधना से महादेव प्रसन्न हुए थे. तभी से यह मान्यता रही है कि जो भक्त नित्य मंदिर में रुद्राभिषेक करता है उसे धन और सम्पन्नता की कमी नहीं रहती.

विगृह  :

   मन्दिर के भीतर, केंद्र में स्वयंभू शिवलिंग स्थापित हैं, तथा मन्दिर के परिक्रमा क्षेत्र में नन्दी, गौरी, गणेश, कार्तिक विराजमान है.

पूजन विधि :

 मंदिर में नित्य षोडषोचार विधि से पूजन होता है.  यहाँ नित्य रुद्राभिषेक भी होता है. नित्य दिन प्रातः महादेव को स्नान करवा कर उनका श्रृंगार किया जाता है, इसके पश्चात प्रातः 4 बजे मंगला आरती के साथ भक्तों के लिए मन्दिर के कपाट खोले जाते हैं. दोपहर में भोग आरती के साथ भगवान को भोग लगाया जाता है. सायं 6 बजे पुनः श्रृंगार होने के बाद रात्री 9:30 बजे शयन आरती होती है. मन्दिर के कपाट अगली सुबह तक के लिए बंद कर दिए जाते हैं. सावन और मलमास के दिनों में यहाँ भक्तों का तांता लगा रहता है. अश्तिग शुक्ल पक्ष की एकादशी में यहाँ पूजन का विशेष महत्व है.

विजय राघव मन्दिर

अयोध्या को मन्दिरों की नगरी भी कहा जाता है, यहाँ करीबन 7000 से अधिक मन्दिर हैं. पर विजय राघव मन्दिर अपने आप में निराला मन्दिर है.  यह रामानुज सम्प्रदाय का प्राचीन एवं प्रमुख मन्दिर   है. जो कि विभीषण कुण्ड के सामने स्थित है. मन्दिर की स्थापना 1904 के लगभग स्वामी बलरामाचारी द्वारा की गयी थी. इस मन्दिर में स्थापित प्रभु राम के विगृह को दक्षिण भारत से ही लाया गया था. यह मन्दिर रामानुज सम्प्रदाय के अत्यंत महत्व वाला मन्दिर है. वैष्णवों के लिए यह स्थान किसी तीर्थ से कम नहीं है. इस मन्दिर में अनुशासन के साथ गुरुकुल एवं वैदिक परम्पराओं का अनुसरण किया जाता है. यह अयोध्या का एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ आज के आधुनिक काल में भी विद्युत् की व्यवस्था नहीं है. और न ही विद्युत् से चलने वाले उपकरणों का उपयोग किया जाता है.मान्यता है कि बिजली की चकाचौंध में भगवान श्री राम के आभा मण्डल के दर्शन नहीं हो पाते हैं. और इन अप्राकृतिक उजाले के सामने भगवान की आँखें चौंधिया जाती हैं. इस लिए शाम होते ही इस मन्दिर में उजाले की वैकल्पिक व्यवस्था की तैयारी होने लगती है. मन्दिर परिसर में जगह जगह लालटेन की रौशनी में पूजा अर्चना, भोग प्रसाद व अन्य कार्य होते हैं. मन्दिर परिसर में अभी 3 जीवित कुएं हैं.  भगवान के भोग और प्रसाद के लिए रसोई में बने कुएं के प्राकृतिक पानी का उपयोग किया जाता है. तथा भोजन के लिए पत्तलों और कुल्हड़ का इस्तेमाल होता है. यहाँ सभी खाद्य पदार्थ और भोग प्रसाद शुद्ध देशी घी में बनता है. मन्दिर परिसर में ही एक गौशाला है. गायों की सेवा के लिए गौशाला में बने कुएं के पानी का उपयोग किया जाता है. एक अन्य कुएं से आगंतुकों के पीने की व्यवस्था होती है. मन्दिर के भीतर भगवान को हवा करने के लिए छत में पंखा झलने की व्यवस्था है. साथ ही आरती के समय श्रद्धालुओं के लिए भी हस्त बेना की व्यवस्था है. मन्दिर परिसर में बने विश्रामगृहों में शयन और विश्राम के लिए कम्बलों का उपयोग किया जाता है.

विगृह :

गर्भ गृह में भगवान श्री राम, लक्ष्मण माता जानकी के मुख्य विग्रह हैं, यह विगृह अष्टधातु के हैं. तथा यहाँ 1000 से अधिक शालिग राम विराजमान हैं.

भोग/ पूजा विधि :

यहाँ नित्य उत्तर पूर्व दिशा में महाभारत का पाठ, उत्तर पश्चिम में रामयाण का पाठ, पश्चिम दक्षिण में श्रीमद भगवत पुराण तथा दक्षिण पूर्व में विष्णु पुराण का पाठ होता है. किसी भी पूजा विधि या पाठ में गलती न होने का विशेष ध्यान रखा जाता है. यहाँ पूजा विधि और उसकी उसकी सुचिता का विशेष ध्यान रखा जाता है, नित्य प्रातः 7:30 भोर आरती के साथ मन्दिर के कपाट दर्शन के लिए खुलते हैं, मध्यान्ह 12 बजे भोग आरती के बाद सायं आरती 7 बजे होती है, रात्रि में 8 बजे शयन आरती के पश्चात मंदिर के कपाट बन्द कर दिए जाते हैं.

लव कुश मन्दिर, अयोध्या जी

लवकुश मन्दिर

यह मन्दिर अयोध्या के ह्रदय कहे जाने वाले रामकोट में राम जन्म भूमि के निकट स्थित है. यह स्थाम यूँ तो श्री राम के पुत्र लव कुश जी का  है, पर यहाँ सावन झूला महोत्सव और तुलसी शालिगराम विवाह अत्यंत प्रचलित है. राम जन्म भूमि के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु भगवान श्री राम के पुत्रगण लव कुश के दर्शन अवश्य करते हैं. मन्दिर को कुछ विशेष अवसरों पर भव्यता के साथ सजाया जाता है. सावन माह में पूरे महीने रुद्राभिषेक होता है, सावन में मंदिर प्रांगढ में सावन झूला पड़ता है तथा कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रवाधनी एकादशी के अवसर पर अयोध्या प्रसिद्द तुलसी माता और शालिग राम का विवाह बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है.

विगृह : मन्दिर के गर्भ गृह में भगवान श्री राम का दरबार सजा है, जिसमें करीब 400 वर्ष पुराने  भगवान राम और माता सीता के विगृह भी रखे हुए हैं. इसके अलावा यहाँ द्वादश लिंग और स्फटिक के शिवलिंग भी विराजमान हैं. दतियाँ कलां की कुल देवी बंगलामुखी का भी स्थान विराजमान है.

पूजा विधि :

    यह मन्दिर प्रातः 6:30 बजे आम दर्शन के लिए मंगला आरती के बाद खुलता है, प्रातः 8 बजे बाल भोग आरती, दोपहर 11:30 बजे मध्यान्ह आरती, सायं 6 बजे संध्या आरती और रात्री शयन आरती 8 बजे की जाती है.

कनक भवन

कनक भवन अयोध्या का एक महत्वपूर्ण मंदिर है। यह मंदिर सीता और राम के सोने के मुकुट पहने प्रतिमाओं के लिए लोकप्रिय है. मुख्य मंदिर आतंरिक क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें रामजी का भव्य मंदिर स्थित है। यहां भगवान राम और उनके तीन भाइयों के साथ देवी सीता की सुंदर मूर्तियां स्थापित हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार राम विवाह के पश्‍चात् माता कैकई के द्वारा सीता जी को कनक भवन मुंह दिखाई में दिया गया था। जिसे भगवान राम तथा सीता जी ने अपना निज भवन बना लिया . धार्मिक आख्‍यानों के अनुसार कनक भवन का निर्माण महारानी कैकेयी के अनुरोध पर अयोध्‍या के राजा दशरथ द्वारा विश्वकर्मा की देखरेख में श्रेष्ठ शिल्पकारों के द्वारा कराया गया था। कनक भवन के किसी भी उपभवन में पुरूषों का प्रवेश वर्जित था। भगवान के परम भक्‍त हनुमान जी को भी बहुत अनुनय विनय करने के बाद आंगन में ही स्‍थान मिल पाया। इसी मान्यता के तहत कनक भवन के गर्भगृह में भगवान श्रीराम-जानकी के अलावा किसी अन्य देवता का विग्रह स्थापित नहीं किया गया है। त्रेता युग में भगवान राम के श्रीधाम जाने के बाद उनके पु्त्र कुश ने कनक भवन में रामसीता के मूर्तियां स्‍थ‍ापित की । यह भवन अयोध्‍या के पराभव के बाद जर्जर हो गया। बताया जाता है कि कनक भवन से विक्रमादित्‍य कालीन एक शिलालेख प्राप्‍त हुआ जिसके अनुसार द्वापर युग में जब कृष्ण जरासंध का वध करने के उपरान्‍त प्रमुख तीर्थों की यात्रा करते हुए अयोध्या आए तो कनक भवन के टीले पर एक पद्मासना देवी को तपस्या करते हुए देखा और टीले का जीर्णोद्धार करवाकर मूर्तियाँ पुनस्थापित की। इसी शिलालेख में ही आगे वर्णन है संवत् 2431 आज से लगभग 2070 वर्ष पूर्व को समुद्रगुप्त ने भी इस भवन जीर्णोद्धार करवाया। सन् 1761ई. में भक्त कवि रसिक अलि ने कनक भवन के अष्टकुंज का जीर्णोधार करवाया था। वर्तमान के कनक भवन का निर्माण ओरछा राज्‍य के राजा सवाई महेन्द्र श्री प्रताप सिंह की पत्नी महारानी वृषभानु कुंवरि की देखरेख में कराया गया था। सन् 1891 ई. को उनके द्वारा  प्राचीन मूर्तियों की पुनस्र्थापना के साथ ही राम सीता की दो नये विग्रहों की भी प्राण प्रतिष्ठा करवाई गई ।

 विग्रह :

मंदिर के गर्भगृह के पास ही शयन स्थान है जहां भगवान राम शयन करते हैं। इस कुन्ज के चारों ओर आठ सखियों के कुंज हैं। जिन पर उनके चित्र स्‍थापित किए गये है । सभी सखियाँ की भिन्न सेवायें हैं जो भगवान के मनोरंजन तथा क्रीड़ा के लिये प्रबन्ध करती थी इसी प्रकार                                    क्षेमा, हेमा, वरारोहा, लक्ष्मण, सुलोचना, पद्मगंधा, सुभगा की भगवान के लिए सेवाएं भिन्‍न भिन्‍न है। ये आठों सखियां भगवान राम  की सखियाँ कही जाती हैं। इनके अतिरिक्त आठ सखियाँ और हैं जिन्‍हे सीताजी की अष्टसखी कही जाती हैं। उनमें चन्द्र कला, प्रसाद, विमला, मदन कला , विश्व मोहिनी,  उर्मिला, चम्पाकला, रूपकला  हैं। मान्यता है कि किशोरी जी प्रतिदिन श्रीराम को उनके भक्तों अर्थात भक्तमाल की कथा सुनातीं है। इसी भावना के तहत भक्तमाल की पुस्तक भी रखी रहती है। जानकी संग भगवान श्रीराम प्रतिदिन चौपड़ भी खेलते हैं, इसके लिए चौपड़ की भी व्यवस्था की गयी है।         चैत्र रामनवमी, सावन झूलनोत्सव, अन्नकूट, दीपावली श्रीहनुमत्-जयन्ती,महालक्ष्मी पूजन, दीपावली, अन्नकूट, तथा ग्यारस (देव उत्थानी एकादशी आदि पर्व मंदिर में धूमधाम से मनाया जाता है।

रंगमहल

सोवे  जुगल किशोर महल बिच

नूपुर दाब चलो मोरी  सजनी

पहरे दार सजग हुई रहियो

तनक झनक न होय महल बिच

सोवे जुगल किशोर महल बिच…..!

 अयोध्या के रामकोट मोहल्ले में राम जन्म भूमि के निकट भव्य रंग महल मन्दिर स्थित है. ऐसा माना जाता है कि जब सीता माँ विवाहोपरांत अयोध्या की धरती पर आयीं. तब कौशल्या माँ को सीता माँ का  स्वरुप इतना अच्छा लगा कि उन्होंने रंग महल सीता जी को मुँह दिखाई में दिया. विवाह के बाद भगवान श्री राम कुछ 4 महीने इसी स्थान पर रहे. और यहाँ सब लोगों ने मिलकर होली  खेली थी. तभी से इस स्थान का नाम रंगमहल हुआ. इस मन्दिर में आज भी होली का त्यौहार हर्षोल्लास से मनाया जाता है. फाल्गुन माह में यहाँ होली खेलने का विशेष इंतजाम होता है. यहाँ चारों अखाड़े के नागा साधू होली खेलने आते हैं. माघ पंचमी को यहाँ सीता राम विवाह मनाया जाता है. विवाह समारोह से पहले पूरे अयोध्या में एक विशाल झांकी का आयोजन किया जाता है. जिसमें हांथी, घोड़े, रथ समेत हजारों भक्त झांकी में शामिल होते हैं. सीता राम के विवाह के समय द्वारचार, कन्यादान, भांवर, कलेवा आदि अनुष्ठान विधिवत होते हैं. सम्पूर्ण विवाह मैथली शैली में आयोजित होते हैं.

विशेष : सखी सम्प्रदाय का मंदिर होने से इस स्थान का महत्व अत्यंत वृहद हो जाता है और दर्शनीय हो जाता है यहाँ नित्य भगवान राम को शयन करते समय पुजारी सखी का रूप धारण करती हैं, भगवान को सुलाने के लिए ये सखियाँ लोरी सुनाती हैं, और उनके साथ रास करती हैं. इस स्थान पर सरयू नाम की गाय भी भगवान राम की आराधना में लीन रहती है,

पूजा विधि :

 मन्दिर में अष्टमयाम विधि से पूजा अर्चना होती है, प्रातः 3 बजे ठाकुर जी को उठाया जाता है, मंगला आरती के साथ मन्दिर के कपाट दर्शन के लिए खोले जाते हैं. सुबह 8 बजे श्रृंगार आरती होती है, मध्यान्ह 3 बजे पुनः श्रृंगार होता है, शाम 6 बजे सायं आरती और 8:30 बजे शयन आरती.

रत्न सिंहासन/ राजगद्दी

रत्न सिंहासन/ राजगद्दी

 रत्न सिंहासन या राजगद्दी वह स्थान है जहाँ श्री राम भगवान ने 11000 वर्ष बैठ के राज किया. उन्होंने यहाँ बैठ के ही अपनी प्रजा का न्याय किया. जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम लंका के राजा रावण का वध करके पहली बार अयोध्या वापस आये, तब उनका राज्याभिषेक इसी सिंहासन पर किया गया. हर्षित होकर देवताओं ने फूल बरसाए, इंद्र कुबेर ने सोने चांदी एवं मणियों से सवा प्रहर तक राज्याभिषेक किया. पूरे अयोध्या को दीपों से सजाया गया. इस मन्दिर के गर्भ गृह में  प्रभु श्री राम जी हैं, दाहिने तरफ लक्ष्मण जी और बाएं तरफ जगत माता सीता जी विराजमान हैं . उनके पीछे अत्यंत प्राचीन विग्रह हैं, जो कि लगभग 2070 वर्ष पहले राजा विक्रमादित्य को सरयू जी में स्नान करते समय मिले थे.. उनमें से बाएं तरफ चांदी के राम और सोने की सीता जी विराजमान हैं. यह सिंहासन अत्यंत कीमती है. सिंहासन का द्वार पांच मन चाँदी से बना हुआ है तथा सवा दो मन चाँदी से यह सिंहासन बना हुआ है. मन्दिर परिसर में सीता रसोईं भी  है, जिसमें बैठी हुयी सीता जी की प्रतिमा है. रसोई में चकला बेलन व रसोई में उपयोग होने वाली अन्य वस्तुएं भी रखी हैं.इसके समीप सीता महल भी बना हुआ है.

मणि पर्वत, अयोध्या जी

मणि पर्वत

मणि पर्वत मन्दिर  लगभग 200 फीट ऊँचे टीले पर स्थित है. इसकी छत से पुरे अयोध्या के दर्शन होते हैं. भगवान श्री राम के विवाह के पश्चात से यहाँ झूले की परंपरा चली आ रही है. मान्यता है कि झुला महोत्सव के रूप में मनाये जाने वाले इस अवसर पर अयोध्या में विराजमान समस्त भगवान यहाँ झूला झूलने आते हैं. सावन के महीने में माता सीता ने जी ने इस स्थान पर पंचमी मनाई थी, झूला झूली थी. तभी से यहाँ झूला उत्सव मनाया जाता है.  यह उत्सव  शुक्ल पक्ष तृतीया से शुरू होता है और पूर्णिमा तक चलता है. पौराणिक मान्यता के अनुसार राजा जनक ने राजा दशरथ को इतनी मणियाँ दी थीं कि यहाँ पहाड़ बन गया.  इस लिए इसका नाम मणि पर्वत रखा गया है.  जब भगवान राम के विवाहोपरांत  जनक जी अयोध्या नगरी आये तो उन्होंने सोचा अयोध्या में भगवान राम का नाम, रूप, लीला धाम चारों मिल जाते हैं. इसका महात्म्य  जान के जनक जी ने दशरथ जी से जमीन खरीदी थी , उसी जमीन की  कीमत में उन्होंने इतनी मणि  उपहार में भेजी  कि यह  टीला बन गया. एक और प्रसंग में इस बात का उल्‍लेख किया गया है कि जब भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्‍मण को मेघनाद ने युद्ध के दौरान घायल कर दिया था तो उनहे संजीवनी बूटी की जरूरत थी और हनुमान जी   संजीवनी बूटी वाला पूरा पहाड़ ही उठाकर ले आए थे। किवंदतियों के अनुसार, पहाड़ का छोटा सा हिस्‍सा यहां गिर गया था। यह माना जाता है कि भगवान बुद्ध, अयोध्‍या में 6 साल रूके थे और उन्‍होने मणि पर्वत पर ही अपने शिष्‍यों को धर्म का ज्ञान दिया था। इस पर्वत पर सम्राट अशोक के द्वारा बनवाया एक स्‍तुप है। इस पर्वत के पास में ही प्राचीन बौद्ध मठ भी है।

ऐतिहासिक गुरुद्वारा ब्रम्हकुण्ड साहिब, अयोध्या जी

ऐतिहासिक गुरुद्वारा ब्रम्हकुण्ड

यह तीर्थ सिखों के लिए अत्यंत पवित्र है. सिखों के प्रथम नवं एवं दसम गुरुओं ने इस धरती पर अपने श्री चरण रखे. गुरुओं के आने और यहाँ प्रवचन देने से इस स्थान की महत्ता और बढ़ गयी.  उसके पूर्व से यह स्थान ब्रम्ह कुण्ड के नाम से जाना जाता था. बताया जाता है जब श्री राम अयोध्या पूरी को आये थे, उस समय सारे देवता यहाँ आये थे राजतिलक देने के लिए. राजतिलक में ब्रम्हा जी भी आये थे. राज्याभिषेक होने के बाद ब्रम्हा जी ने राम चन्द्र जी से कहा कि  मेरा भी उद्धार करो, तब श्री राम चन्द्र जी ने कहा कि तुम तप करो. पहले इस जगह का प्राचीन नाम तीर्थराज था. ब्रम्हा जी ने श्रृष्टि निर्माण से पूर्व  यहाँ 5000 वर्ष तप किया. तब से इस स्थान का नाम ब्रम्ह कुण्ड पड़ा. इसी ब्रम्ह कुण्ड स्थान पर सिखों के ब्रम्ह स्वरुप गुरु साहिब जी आये और यह स्थान गुरुद्वारा ब्रम्ह कुण्ड नाम से प्रसिद्द हुआ.  सिखों के  प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव जू महाराज हरिद्वार से जगन्नाथपुरी की यात्रा को जाते  समय संवत 1575 विक्रमी में  सरयू तट पर विराजे,  उन्होंने यहाँ एक वृक्ष के नीचे सत्संग भी किया. इसी प्रकार से सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी महाराज अपनी आसाम यात्रा से आनंदपुर साहब (पंजाब ) जाते समय संवत 1725 विक्रमी में उक्त स्थान (श्री गुरुनानक देव जी) के मंजी साहब पर मत्था टेका.तथा  सामने ही बैठकर 48 घंटे अखंड तप किया,  वह इस पवित्र स्थान से धन्य होकर अपने चरण पादुका अपने एक सेवक को भेंट स्वरुप दे गए थे, जिन्हें आज भी ब्रम्हकुण्ड गुरूद्वारे में प्रदर्शनी के तौर पर रखा गया है. संवत 1729 विक्रमी में पटना से आनंदपुर जाते समय माता गुजरी जी मामा कृपाल चन्द्र जी के साथ  सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोविन्द सिंह जी इस स्थान पर पधारे थे. उस समय से इस स्थान पर बंदरों को चने भी खिलाने की प्रथा है . उस समय गुरु गोविन्द सिंह जी ने अपने सेवकों को  उनके शस्त्र, तीर, खंजर, चक्र भेंट कर गए. जो कि गुरुद्वारा परिसर में आज भी संरक्षित हैं और दर्शन के लिए उपलब्ध रहते हैं. यह गुरुद्वारा सरयू तट के किनारे बना हुआ. यहाँ से सरयू के विहंगम दृश्य को महसूस किया जा सकता है. यहाँ प्रत्येक रविवार लंगर चलता है. तथा गुरु पर्व पर झांकी और उत्सव का आयोजन होता है.

कोरिया की रानी ‘हो’ का स्मृति स्थल

यह कम अचरज की बात नहीं है कि हमारे देश विभिन्न धर्मों के गुरुओं ने अयोध्या की पावन धरती को भक्ति भाव से अभिसिंचित किया है. तब और आश्चर्य होता है जब यह पता चलता है कि यहाँ से हजारों किलोमीटर दूर  दक्षिण कोरिया के लिए भी यह स्थान उतना ही महत्वपूर्ण है जितना हम भारतियों के लिए . कोरिया की पुरातन इतिहास गाथा के अनुसार प्राचीन कोरियाई कारक राज्य के संस्थापक राजा सूरो की धर्मपत्नी रानी हो का जन्म अयोध्या नगर में हुआ था.  कोरिया में कारक गोत्र के तक़रीबन साठ लाख लोग ख़ुद को राजा सुरो और अयोध्या की राजकुमारी के वंश का बताते हैं. इस पर यक़ीन रखने वाले लोगों की संख्या दक्षिण कोरिया की आबादी के दसवें हिस्से से भी ज़्यादा है. यहाँ तक दक्षिण कोरिया के पूर्व राष्ट्रपति किम डेई जंग और पूर्व प्रधानमंत्री हियो जियोंग और जोंग पिल किम इस वंश से आते थे. इस वंश के लोगों ने उन पत्थरों को संभाल कर रखा है, जिनमे रानी हो के अयोध्या से सम्बन्ध का उल्लेख है. ऐसा माना जाता है कि अयोध्या की राजकुमारी अपनी समुद्र यात्रा के दौरान नाव को संतुलित रखने के लिए साथ लाई थीं. किमहये शहर में इस राजकुमारी की प्रतिमा भी है. दक्षिण कोरियाई लोगों के लिए यह पूजनीय स्थान है. इसलिए न केवल उन्होंने रानी हो के नाम से स्मारक बनवाया बल्कि पिछले 15 वर्षों से वहाँ का एक दल यहाँ आकर इस स्थान पर अपने विधि विधान से पूजा करते हैं. कारक वंश के लोगों का एक समूह हर साल फ़रवरी मार्च के दौरान इस राजकुमारी की मातृभूमि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने अयोध्या आता है. उनके द्वारा स्थापित एक शिलालेख में लिखा है “ कोरिया की पुरातन इतिहास गाथा ‘ साम कुक यूसा’ के अनुसार प्राचीन कोरियाई कारक राज्य के संस्थापक राजा सूरो की धर्मपत्नी रानी हो का जन्म अयोध्या नगर में हुआ था. रानी हो अयोध्या की राजकुमारी थीं. पिता अयोध्या नरेश ने देवी संकेत मिलने पर उनको राजा सूरो से विवाह करने हेतु दीर्घ समुद्र मार्ग से दक्षिण कोरिया स्थित कारक राज्य भेजा.  रानी हो के वंशजों की संख्या अब 60 लाख से अधिक है जिनमें किम हे किम, हो, एवं इंछौन ली गौत्र सम्मिलित हैं. उनके प्रसिद्द वंशजों में गण्य हैं. 7 वीं शताब्दी में कोरियाई राज्यों का प्रथम एकीकरण करने वाले जनरल किम यू-शिन तथा सम्प्रति कोरियाई राष्ट्रपति किम दे-चुंग और प्रधान मंत्री किम जौंग-पिल.  यह स्मारक रानी हो के वंशजों द्वारा इस ऐतिहासिक नगर अयोध्या में भारत व कोरिया के प्राचीन सम्बन्ध तथा उनके विकासशील भविष्य के प्रतीक स्वरुप स सौहार्द निर्मित है.”

 

 

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