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हनुमानगढ़ी महत्व

प्रभु श्री राम के अनन्य भक्त श्री हनुमान को अयोध्या का राजा कहा जाता है. इसलिए उनका स्थान किले के रूप में भव्य है. हनुमानगढ़ी अयोध्या नगरी के प्रमुख स्थानों में से एक है . ऐसी मान्यता है कि पावन नगरी अयोध्या में सरयू नदी में पाप धोने से पहले लोगों को भगवान हनुमान से आज्ञा लेनी होती है। मन्दिर की भव्यता और उसका सौन्दर्य देखते ही बनता है. सिन्दूरी, हरे रंग में रंगे मन्दिर की दीवारे धूप और छाँव में खिलती हैं. ।  मंदिर के भीतर भारतीय संस्कृति और पौराणिक कथाओं अनुरूप कलाकृतियाँ देखी जा सकती हैं, इस भव्य मंदिर के दीवारों स्तंभों पर महीन एवं आकर्षक कलाकृतियों को उकेरा गया है. उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के दरबार की बत्तीस पुतलियाँ यहाँ विभिन्न मुद्राओं में मंदिर के स्तंभों पर अंकित हैं. दीवालों पर राम राम, भक्तों के मुख से राम नाम का जाप, हनुमान चालीसा का पाठ इस मन्दिर को श्रेष्ठ स्थान बना देता है. यह किले नुमा मन्दिर अपने आप में अनूठा है. मंदिर तक पहुंचने के लिए 76 सीढि़यां चढ़नी पड़ती हैं।

बताया जाता है, कि लगभग 400 वर्ष पहले यह एक टीला हुआ करता था. तपस्वी महंत अभय राम दास जी इसी टीले पर रह कर हनुमान जी की सेवा किया करते थे, उस समय अवध के नवाब मंसूर अली किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त थे, उन्ही के एक दरबारी की सलाह के बाद वह खुद चलके इस गद्दी तक आये. महंत अभय राम दास जी हनुमान जी के सिद्ध भक्त थे. इस गद्दी पर आने के बाद और महंत की हनुमान जी से प्रार्थनाओं के कारण मंसूर अली को स्वास्थ्य लाभ हुआ. बताया जाता है कि हनुमान की ही कृपा से मंसूर अली को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी थी. वह यहाँ की महिमा से कृतज्ञ थे. उनकी मदद से ही संत अभयराम दास जी ने इस स्थान को किले नुमा भव्य मन्दिर बनवाया. तभी से इस स्थान को हनुमान गढ़ी कहा जाने लगा.

 

 

 

नागेश्वर नाथ का महत्व

स्वर्ग द्वारे नरः स्नात्वा दृष्टवा नागेश्वरम शिवम् ! पूजयित्वा च विधिंवत सर्वान कामान्वाप्न्युयात !!

सरयू नदी किनारे स्वर्गद्वार पर स्थित श्री नागेश्वर नाथ मन्दिर बाहर से देखने में बेहद साधारण लगता है, पर मान्यता और ऐतिहासिकता के आधार पर यह मन्दिर विशेष महत्व रखता है. यह मन्दिर राम की पैड़ी पर है, भारत वर्ष के 108 ज्योतिर्लिंगों में से यह एक ज्योतिर्लिंग है. ऐसा माना जाता है कि यह मन्दिर लाखों वर्ष पहले भगवान राम के कनिष्ठ पुत्र श्री कुश के द्वारा स्थापित किया गया था.    मन्दिर के महंत के अनुसार  जिस समय भगवान राम अपने निज धाम को जाने लगे तो अयोध्या का राज्य अनजनी नंदन एवं चिरंजीव कुश को कुशावर्त (कुशावती नगरी) क्षेत्र का राज्य दे गए थे. अपने राज्य का संचालन करते हुए श्री कुश  जी को अयोध्या दर्शन की इच्छा जाग्रत हुयी. इस विचार से वे अयोध्या आये, दर्शन के पश्चात स्वर्गद्वार तीर्थ में स्नान करने लगे. तभी उनके हाथ का स्वर्ण कंगन सरयू जी के जल में गिर गया. स्वर्ण कंगन को नाग कन्या कुमुदनी ने पाया, और वह उसे लेकर पाताल लोक चली गयीं. जब खोज करने पर भी कुश जी को कंगन नहीं मिला तो वह क्रोधित हुए, उन्होंने पाताल लोक का नाश करने का संकल्प ले लिया. कुश ने रौद्र रूप को देख  कुमुद भयभीत हुयी और भगवान शंकर की प्रार्थना करने लगीं.  भगवान शंकर ने कुश के क्रोध से बचाने के लिए   दर्शन दिए. भगवान शंकर को देख कर कुश जी का क्रोध ख़त्म हो गया. उन्होंने धनुष बाण रख दिया एवं साष्टांग प्रणाम कर उनका षोडषो पूजन किया और कहा कि नाग की प्रार्थना पर प्रसन्न होकर आप यहाँ प्रकट हुए इसलिए इस स्थान की नागेश्वर नाथ के नाम से प्रसिद्धि हो. यही स्वर्गद्वार पवित्र तीर्थ में नागराज के संरक्ष्नार्थ श्री कैस्लाश नाथ भगवान शंकर जी आये इसी से इनका नाम नागेश्वर नाथ पड़ा.

स्वर्गद्वार स्थित इस मन्दिर के उत्तर पूर्व एवं पश्चिम में 3 विशाल दरवाजे हैं, गर्भगृह में नागों से वेष्टित प्रधान शिवलिंग है. इसकी विशेषता है कि यह अर्ध्य गोलाकार है, इसके सम्मुख मातेश्वरी जगदम्बा माँ के दिव्य दर्शन है. गर्भगृह के बाहर मन्दिर  प्रांगण में दक्षिण भिसुण्डी श्री गणेश जी हैं एवं नन्दी  के तीन श्री विग्रह सुण्डी के सम्मुख हैं, इसके अतिरिक्त बगल में राम मन्दिर एवं नन्दीकेश्वर के दर्शन हैं. मन्दिर के बाहर स्तंभों पर गणों एवं देवी देवताओं के विग्रह हैं जो मूर्तिकला की द्रष्टि से बड़े ही महत्वपूर्ण और दर्शनीय हैं.

 

 

कालेराम मंदिर का महत्व

काले राम मंदिर राम की पैड़ी के पास स्थित नागेश्वर नाथ मंदिर के ठीक पीछे है, यह मन्दिर भी प्राचीन मन्दिरों में गिना जाता है. मन्दिर के महंत के अनुसार के राजा दर्शन सिंह के समय लगभग  1748 में भारत के महाराष्ट्रिय ब्राह्ममण योगी पं0 श्री नरसिंह राव मोघे को  एक स्वप्न में हुए आदेश के अनुसार श्रीरामचन्द्र जन्मभूमि के पंचायतन विग्रह की प्राप्ति ब्राह्मण योगी को सहस्त्रधारा लक्ष्मण घाट पर स्नान करते समय सरयू नदी में हुई. जिसकी स्थापना  उन्होने सुप्रसिद्ध  नागेश्वरनाथ के सानिध्य की जो आज श्री कालेराम मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ हजारों रामभक्त नित्य दर्शन एवं उपासना कर अपनी मनौतियों को पूर्ण करते है  इस मन्दिर की विशेषता ये है कि यहाँ सम्पूर्ण श्रीरामपंचायतन एक ही शालिग्राम शिला में है जो अन्यत्र दुलर्भ है

विग्रह :

मन्दिर के गर्भ गृह में राम जी उनके वामांग में किशोरी जी, उनके वमांग में भरत लाल जी, राम जी के दक्षिण लक्ष्मण जी, उनके दक्षिण शत्रुघ्न लाल जी श्री रामपंचायतन राज्य अभिषेक का दर्शन है. श्री राम पंचायतन के ठीक सामने दक्षिणाभिमुख श्री हनुमान जी का विग्रह भी दुर्लभ है जो कि श्यामवर्ण में है ।   मन्दिर से सटा हुआ एक छोटा राम नाम का मन्दिर है जिसमें 15 करोड़ ‘‘ श्री राम जय राम जय जय राम ’’ त्रियोदशाक्षरी मंत्र जो आन्नद रामायण से प्रतिपादित है

 

 

 

छोटी देवकाली का महत्व

 मान्यता है कि छोटी  देवकाली की प्रतिष्ठा माता जानकी की ग्राम देवी या कुल देवी के रूप में हुयी. जगत जननी माँ सीता जी विवाहोपरांत अपने पितृ गृह जनकपुरी से जब  अयोध्या के लिए चलीं, तो अपनी कुल देवी जो कि  गौरी मंगला के रूप में थीं, अपने साथ ले आयीं. इसके पश्चात महाराज दशरथ जी ने अयोध्या स्थित सप्तसागर के ईशानकोण  पर एक मन्दिर बनवा दिया. लक्ष्मीस्वरूपा माता सीता जी नित्य निज निवास कनक भवन से आकर माँ  छोटी देवकाली का पूजन करती थीं.  ग्राम देवी या कुलदेवी की आराधना के फलस्वरूप ही सीता जी को उन्हें भगवान राम जैसा सुयोग्य वर मिला. उसी मान्यता की आस्था आज भी जीवित है. छोटी देवकाली के दर्शन मात्र को दूर दराज़ से नव वधुएँ यहाँ आज भी उत्साह से आती हैं और माँ का आशीर्वाद सुयोग्य वर के रूप में पाती हैं.  छोटी देवकाली मन्दिर के महत्व का उद्धरण स्कन्द पुराण और रुद्रयामल में मिलता है.  पौराणिक आख्यानों में अत्रि संहिता के मिथिला खंड में मिथिला की ग्राम देवी के रूप में उनका उल्लेख है । महर्षि वेदव्यास ने रुद्रयामल तंत्र व स्कंदपुराण में ईशानी देवी के नाम से छोटी देवकाली मंदिर का वर्णन किया है। स्कंदपुराण में ‘विदेह कुलदेवी च सर्वमंगलकारिणी श्लोक में इसका उल्लेख है। इस श्लोक में विस्तार से बताया कि इन सर्वमंगलकारिणी, स्कंदमाता, शिवप्रिया भवानी का पूजन करने से समस्त प्रकार के इष्ट पूरे होते हैं। रुद्रयामल तंत्र में श्री सीता द्वारा प्रतिदिन छोटी देवकाली मंदिर में पूजन का उल्लेख हैं। कई इतिहासकारों, दार्शनिकों और पर्यटकों ने भी इसकी महिमा का बखान अपने लेखों में किया है. यह मन्दिर फैजाबाद अयोध्या मार्ग पर हनुमान गढ़ी से आगे डाक खाने के पास गली में स्थित है.

 

 

 

 

 

 

छोटी देवकाली का महत्व

 मान्यता है कि छोटी  देवकाली की प्रतिष्ठा माता जानकी की ग्राम देवी या कुल देवी के रूप में हुयी. जगत जननी माँ सीता जी विवाहोपरांत अपने पितृ गृह जनकपुरी से जब  अयोध्या के लिए चलीं, तो अपनी कुल देवी जो कि  गौरी मंगला के रूप में थीं, अपने साथ ले आयीं. इसके पश्चात महाराज दशरथ जी ने अयोध्या स्थित सप्तसागर के ईशानकोण  पर एक मन्दिर बनवा दिया. लक्ष्मीस्वरूपा माता सीता जी नित्य निज निवास कनक भवन से आकर माँ  छोटी देवकाली का पूजन करती थीं.  ग्राम देवी या कुलदेवी की आराधना के फलस्वरूप ही सीता जी को उन्हें भगवान राम जैसा सुयोग्य वर मिला. उसी मान्यता की आस्था आज भी जीवित है. छोटी देवकाली के दर्शन मात्र को दूर दराज़ से नव वधुएँ यहाँ आज भी उत्साह से आती हैं और माँ का आशीर्वाद सुयोग्य वर के रूप में पाती हैं.  छोटी देवकाली मन्दिर के महत्व का उद्धरण स्कन्द पुराण और रुद्रयामल में मिलता है.  पौराणिक आख्यानों में अत्रि संहिता के मिथिला खंड में मिथिला की ग्राम देवी के रूप में उनका उल्लेख है । महर्षि वेदव्यास ने रुद्रयामल तंत्र व स्कंदपुराण में ईशानी देवी के नाम से छोटी देवकाली मंदिर का वर्णन किया है। स्कंदपुराण में ‘विदेह कुलदेवी च सर्वमंगलकारिणी श्लोक में इसका उल्लेख है। इस श्लोक में विस्तार से बताया कि इन सर्वमंगलकारिणी, स्कंदमाता, शिवप्रिया भवानी का पूजन करने से समस्त प्रकार के इष्ट पूरे होते हैं। रुद्रयामल तंत्र में श्री सीता द्वारा प्रतिदिन छोटी देवकाली मंदिर में पूजन का उल्लेख हैं। कई इतिहासकारों, दार्शनिकों और पर्यटकों ने भी इसकी महिमा का बखान अपने लेखों में किया है. यह मन्दिर फैजाबाद अयोध्या मार्ग पर हनुमान गढ़ी से आगे डाक खाने के पास गली में स्थित है.

 

 

 

 

 

 

 

छोटी देवकाली का महत्व

 मान्यता है कि छोटी  देवकाली की प्रतिष्ठा माता जानकी की ग्राम देवी या कुल देवी के रूप में हुयी. जगत जननी माँ सीता जी विवाहोपरांत अपने पितृ गृह जनकपुरी से जब  अयोध्या के लिए चलीं, तो अपनी कुल देवी जो कि  गौरी मंगला के रूप में थीं, अपने साथ ले आयीं. इसके पश्चात महाराज दशरथ जी ने अयोध्या स्थित सप्तसागर के ईशानकोण  पर एक मन्दिर बनवा दिया. लक्ष्मीस्वरूपा माता सीता जी नित्य निज निवास कनक भवन से आकर माँ  छोटी देवकाली का पूजन करती थीं.  ग्राम देवी या कुलदेवी की आराधना के फलस्वरूप ही सीता जी को उन्हें भगवान राम जैसा सुयोग्य वर मिला. उसी मान्यता की आस्था आज भी जीवित है. छोटी देवकाली के दर्शन मात्र को दूर दराज़ से नव वधुएँ यहाँ आज भी उत्साह से आती हैं और माँ का आशीर्वाद सुयोग्य वर के रूप में पाती हैं.  छोटी देवकाली मन्दिर के महत्व का उद्धरण स्कन्द पुराण और रुद्रयामल में मिलता है.  पौराणिक आख्यानों में अत्रि संहिता के मिथिला खंड में मिथिला की ग्राम देवी के रूप में उनका उल्लेख है । महर्षि वेदव्यास ने रुद्रयामल तंत्र व स्कंदपुराण में ईशानी देवी के नाम से छोटी देवकाली मंदिर का वर्णन किया है। स्कंदपुराण में ‘विदेह कुलदेवी च सर्वमंगलकारिणी श्लोक में इसका उल्लेख है। इस श्लोक में विस्तार से बताया कि इन सर्वमंगलकारिणी, स्कंदमाता, शिवप्रिया भवानी का पूजन करने से समस्त प्रकार के इष्ट पूरे होते हैं। रुद्रयामल तंत्र में श्री सीता द्वारा प्रतिदिन छोटी देवकाली मंदिर में पूजन का उल्लेख हैं। कई इतिहासकारों, दार्शनिकों और पर्यटकों ने भी इसकी महिमा का बखान अपने लेखों में किया है. यह मन्दिर फैजाबाद अयोध्या मार्ग पर हनुमान गढ़ी से आगे डाक खाने के पास गली में स्थित है.

 

 

 

 

 

 

 

छोटी देवकाली का महत्व

 मान्यता है कि छोटी  देवकाली की प्रतिष्ठा माता जानकी की ग्राम देवी या कुल देवी के रूप में हुयी. जगत जननी माँ सीता जी विवाहोपरांत अपने पितृ गृह जनकपुरी से जब  अयोध्या के लिए चलीं, तो अपनी कुल देवी जो कि  गौरी मंगला के रूप में थीं, अपने साथ ले आयीं. इसके पश्चात महाराज दशरथ जी ने अयोध्या स्थित सप्तसागर के ईशानकोण  पर एक मन्दिर बनवा दिया. लक्ष्मीस्वरूपा माता सीता जी नित्य निज निवास कनक भवन से आकर माँ  छोटी देवकाली का पूजन करती थीं.  ग्राम देवी या कुलदेवी की आराधना के फलस्वरूप ही सीता जी को उन्हें भगवान राम जैसा सुयोग्य वर मिला. उसी मान्यता की आस्था आज भी जीवित है. छोटी देवकाली के दर्शन मात्र को दूर दराज़ से नव वधुएँ यहाँ आज भी उत्साह से आती हैं और माँ का आशीर्वाद सुयोग्य वर के रूप में पाती हैं.  छोटी देवकाली मन्दिर के महत्व का उद्धरण स्कन्द पुराण और रुद्रयामल में मिलता है.  पौराणिक आख्यानों में अत्रि संहिता के मिथिला खंड में मिथिला की ग्राम देवी के रूप में उनका उल्लेख है । महर्षि वेदव्यास ने रुद्रयामल तंत्र व स्कंदपुराण में ईशानी देवी के नाम से छोटी देवकाली मंदिर का वर्णन किया है। स्कंदपुराण में ‘विदेह कुलदेवी च सर्वमंगलकारिणी श्लोक में इसका उल्लेख है। इस श्लोक में विस्तार से बताया कि इन सर्वमंगलकारिणी, स्कंदमाता, शिवप्रिया भवानी का पूजन करने से समस्त प्रकार के इष्ट पूरे होते हैं। रुद्रयामल तंत्र में श्री सीता द्वारा प्रतिदिन छोटी देवकाली मंदिर में पूजन का उल्लेख हैं। कई इतिहासकारों, दार्शनिकों और पर्यटकों ने भी इसकी महिमा का बखान अपने लेखों में किया है. यह मन्दिर फैजाबाद अयोध्या मार्ग पर हनुमान गढ़ी से आगे डाक खाने के पास गली में स्थित है.

 

 

 

 

 

 

छोटी देवकाली का महत्व

 मान्यता है कि छोटी  देवकाली की प्रतिष्ठा माता जानकी की ग्राम देवी या कुल देवी के रूप में हुयी. जगत जननी माँ सीता जी विवाहोपरांत अपने पितृ गृह जनकपुरी से जब  अयोध्या के लिए चलीं, तो अपनी कुल देवी जो कि  गौरी मंगला के रूप में थीं, अपने साथ ले आयीं. इसके पश्चात महाराज दशरथ जी ने अयोध्या स्थित सप्तसागर के ईशानकोण  पर एक मन्दिर बनवा दिया. लक्ष्मीस्वरूपा माता सीता जी नित्य निज निवास कनक भवन से आकर माँ  छोटी देवकाली का पूजन करती थीं.  ग्राम देवी या कुलदेवी की आराधना के फलस्वरूप ही सीता जी को उन्हें भगवान राम जैसा सुयोग्य वर मिला. उसी मान्यता की आस्था आज भी जीवित है. छोटी देवकाली के दर्शन मात्र को दूर दराज़ से नव वधुएँ यहाँ आज भी उत्साह से आती हैं और माँ का आशीर्वाद सुयोग्य वर के रूप में पाती हैं.  छोटी देवकाली मन्दिर के महत्व का उद्धरण स्कन्द पुराण और रुद्रयामल में मिलता है.  पौराणिक आख्यानों में अत्रि संहिता के मिथिला खंड में मिथिला की ग्राम देवी के रूप में उनका उल्लेख है । महर्षि वेदव्यास ने रुद्रयामल तंत्र व स्कंदपुराण में ईशानी देवी के नाम से छोटी देवकाली मंदिर का वर्णन किया है। स्कंदपुराण में ‘विदेह कुलदेवी च सर्वमंगलकारिणी श्लोक में इसका उल्लेख है। इस श्लोक में विस्तार से बताया कि इन सर्वमंगलकारिणी, स्कंदमाता, शिवप्रिया भवानी का पूजन करने से समस्त प्रकार के इष्ट पूरे होते हैं। रुद्रयामल तंत्र में श्री सीता द्वारा प्रतिदिन छोटी देवकाली मंदिर में पूजन का उल्लेख हैं। कई इतिहासकारों, दार्शनिकों और पर्यटकों ने भी इसकी महिमा का बखान अपने लेखों में किया है. यह मन्दिर फैजाबाद अयोध्या मार्ग पर हनुमान गढ़ी से आगे डाक खाने के पास गली में स्थित है.

 

 

 

 

 

 

छोटी देवकाली का महत्व

 मान्यता है कि छोटी  देवकाली की प्रतिष्ठा माता जानकी की ग्राम देवी या कुल देवी के रूप में हुयी. जगत जननी माँ सीता जी विवाहोपरांत अपने पितृ गृह जनकपुरी से जब  अयोध्या के लिए चलीं, तो अपनी कुल देवी जो कि  गौरी मंगला के रूप में थीं, अपने साथ ले आयीं. इसके पश्चात महाराज दशरथ जी ने अयोध्या स्थित सप्तसागर के ईशानकोण  पर एक मन्दिर बनवा दिया. लक्ष्मीस्वरूपा माता सीता जी नित्य निज निवास कनक भवन से आकर माँ  छोटी देवकाली का पूजन करती थीं.  ग्राम देवी या कुलदेवी की आराधना के फलस्वरूप ही सीता जी को उन्हें भगवान राम जैसा सुयोग्य वर मिला. उसी मान्यता की आस्था आज भी जीवित है. छोटी देवकाली के दर्शन मात्र को दूर दराज़ से नव वधुएँ यहाँ आज भी उत्साह से आती हैं और माँ का आशीर्वाद सुयोग्य वर के रूप में पाती हैं.  छोटी देवकाली मन्दिर के महत्व का उद्धरण स्कन्द पुराण और रुद्रयामल में मिलता है.  पौराणिक आख्यानों में अत्रि संहिता के मिथिला खंड में मिथिला की ग्राम देवी के रूप में उनका उल्लेख है । महर्षि वेदव्यास ने रुद्रयामल तंत्र व स्कंदपुराण में ईशानी देवी के नाम से छोटी देवकाली मंदिर का वर्णन किया है। स्कंदपुराण में ‘विदेह कुलदेवी च सर्वमंगलकारिणी श्लोक में इसका उल्लेख है। इस श्लोक में विस्तार से बताया कि इन सर्वमंगलकारिणी, स्कंदमाता, शिवप्रिया भवानी का पूजन करने से समस्त प्रकार के इष्ट पूरे होते हैं। रुद्रयामल तंत्र में श्री सीता द्वारा प्रतिदिन छोटी देवकाली मंदिर में पूजन का उल्लेख हैं। कई इतिहासकारों, दार्शनिकों और पर्यटकों ने भी इसकी महिमा का बखान अपने लेखों में किया है. यह मन्दिर फैजाबाद अयोध्या मार्ग पर हनुमान गढ़ी से आगे डाक खाने के पास गली में स्थित है.

 

 

 

 

 

छोटी देवकाली का महत्व

 मान्यता है कि छोटी  देवकाली की प्रतिष्ठा माता जानकी की ग्राम देवी या कुल देवी के रूप में हुयी. जगत जननी माँ सीता जी विवाहोपरांत अपने पितृ गृह जनकपुरी से जब  अयोध्या के लिए चलीं, तो अपनी कुल देवी जो कि  गौरी मंगला के रूप में थीं, अपने साथ ले आयीं. इसके पश्चात महाराज दशरथ जी ने अयोध्या स्थित सप्तसागर के ईशानकोण  पर एक मन्दिर बनवा दिया. लक्ष्मीस्वरूपा माता सीता जी नित्य निज निवास कनक भवन से आकर माँ  छोटी देवकाली का पूजन करती थीं.  ग्राम देवी या कुलदेवी की आराधना के फलस्वरूप ही सीता जी को उन्हें भगवान राम जैसा सुयोग्य वर मिला. उसी मान्यता की आस्था आज भी जीवित है. छोटी देवकाली के दर्शन मात्र को दूर दराज़ से नव वधुएँ यहाँ आज भी उत्साह से आती हैं और माँ का आशीर्वाद सुयोग्य वर के रूप में पाती हैं.  छोटी देवकाली मन्दिर के महत्व का उद्धरण स्कन्द पुराण और रुद्रयामल में मिलता है.  पौराणिक आख्यानों में अत्रि संहिता के मिथिला खंड में मिथिला की ग्राम देवी के रूप में उनका उल्लेख है । महर्षि वेदव्यास ने रुद्रयामल तंत्र व स्कंदपुराण में ईशानी देवी के नाम से छोटी देवकाली मंदिर का वर्णन किया है। स्कंदपुराण में ‘विदेह कुलदेवी च सर्वमंगलकारिणी श्लोक में इसका उल्लेख है। इस श्लोक में विस्तार से बताया कि इन सर्वमंगलकारिणी, स्कंदमाता, शिवप्रिया भवानी का पूजन करने से समस्त प्रकार के इष्ट पूरे होते हैं। रुद्रयामल तंत्र में श्री सीता द्वारा प्रतिदिन छोटी देवकाली मंदिर में पूजन का उल्लेख हैं। कई इतिहासकारों, दार्शनिकों और पर्यटकों ने भी इसकी महिमा का बखान अपने लेखों में किया है. यह मन्दिर फैजाबाद अयोध्या मार्ग पर हनुमान गढ़ी से आगे डाक खाने के पास गली में स्थित है.

 

 

 

 

 

 

छोटी देवकाली का महत्व

 मान्यता है कि छोटी  देवकाली की प्रतिष्ठा माता जानकी की ग्राम देवी या कुल देवी के रूप में हुयी. जगत जननी माँ सीता जी विवाहोपरांत अपने पितृ गृह जनकपुरी से जब  अयोध्या के लिए चलीं, तो अपनी कुल देवी जो कि  गौरी मंगला के रूप में थीं, अपने साथ ले आयीं. इसके पश्चात महाराज दशरथ जी ने अयोध्या स्थित सप्तसागर के ईशानकोण  पर एक मन्दिर बनवा दिया. लक्ष्मीस्वरूपा माता सीता जी नित्य निज निवास कनक भवन से आकर माँ  छोटी देवकाली का पूजन करती थीं.  ग्राम देवी या कुलदेवी की आराधना के फलस्वरूप ही सीता जी को उन्हें भगवान राम जैसा सुयोग्य वर मिला. उसी मान्यता की आस्था आज भी जीवित है. छोटी देवकाली के दर्शन मात्र को दूर दराज़ से नव वधुएँ यहाँ आज भी उत्साह से आती हैं और माँ का आशीर्वाद सुयोग्य वर के रूप में पाती हैं.  छोटी देवकाली मन्दिर के महत्व का उद्धरण स्कन्द पुराण और रुद्रयामल में मिलता है.  पौराणिक आख्यानों में अत्रि संहिता के मिथिला खंड में मिथिला की ग्राम देवी के रूप में उनका उल्लेख है । महर्षि वेदव्यास ने रुद्रयामल तंत्र व स्कंदपुराण में ईशानी देवी के नाम से छोटी देवकाली मंदिर का वर्णन किया है। स्कंदपुराण में ‘विदेह कुलदेवी च सर्वमंगलकारिणी श्लोक में इसका उल्लेख है। इस श्लोक में विस्तार से बताया कि इन सर्वमंगलकारिणी, स्कंदमाता, शिवप्रिया भवानी का पूजन करने से समस्त प्रकार के इष्ट पूरे होते हैं। रुद्रयामल तंत्र में श्री सीता द्वारा प्रतिदिन छोटी देवकाली मंदिर में पूजन का उल्लेख हैं। कई इतिहासकारों, दार्शनिकों और पर्यटकों ने भी इसकी महिमा का बखान अपने लेखों में किया है. यह मन्दिर फैजाबाद अयोध्या मार्ग पर हनुमान गढ़ी से आगे डाक खाने के पास गली में स्थित है.

 

 

 

 

 

 

 

छोटी देवकाली का महत्व

 मान्यता है कि छोटी  देवकाली की प्रतिष्ठा माता जानकी की ग्राम देवी या कुल देवी के रूप में हुयी. जगत जननी माँ सीता जी विवाहोपरांत अपने पितृ गृह जनकपुरी से जब  अयोध्या के लिए चलीं, तो अपनी कुल देवी जो कि  गौरी मंगला के रूप में थीं, अपने साथ ले आयीं. इसके पश्चात महाराज दशरथ जी ने अयोध्या स्थित सप्तसागर के ईशानकोण  पर एक मन्दिर बनवा दिया. लक्ष्मीस्वरूपा माता सीता जी नित्य निज निवास कनक भवन से आकर माँ  छोटी देवकाली का पूजन करती थीं.  ग्राम देवी या कुलदेवी की आराधना के फलस्वरूप ही सीता जी को उन्हें भगवान राम जैसा सुयोग्य वर मिला. उसी मान्यता की आस्था आज भी जीवित है. छोटी देवकाली के दर्शन मात्र को दूर दराज़ से नव वधुएँ यहाँ आज भी उत्साह से आती हैं और माँ का आशीर्वाद सुयोग्य वर के रूप में पाती हैं.  छोटी देवकाली मन्दिर के महत्व का उद्धरण स्कन्द पुराण और रुद्रयामल में मिलता है.  पौराणिक आख्यानों में अत्रि संहिता के मिथिला खंड में मिथिला की ग्राम देवी के रूप में उनका उल्लेख है । महर्षि वेदव्यास ने रुद्रयामल तंत्र व स्कंदपुराण में ईशानी देवी के नाम से छोटी देवकाली मंदिर का वर्णन किया है। स्कंदपुराण में ‘विदेह कुलदेवी च सर्वमंगलकारिणी श्लोक में इसका उल्लेख है। इस श्लोक में विस्तार से बताया कि इन सर्वमंगलकारिणी, स्कंदमाता, शिवप्रिया भवानी का पूजन करने से समस्त प्रकार के इष्ट पूरे होते हैं। रुद्रयामल तंत्र में श्री सीता द्वारा प्रतिदिन छोटी देवकाली मंदिर में पूजन का उल्लेख हैं। कई इतिहासकारों, दार्शनिकों और पर्यटकों ने भी इसकी महिमा का बखान अपने लेखों में किया है. यह मन्दिर फैजाबाद अयोध्या मार्ग पर हनुमान गढ़ी से आगे डाक खाने के पास गली में स्थित है.

 

 

 

 

 

 

 

छोटी देवकाली का महत्व

 मान्यता है कि छोटी  देवकाली की प्रतिष्ठा माता जानकी की ग्राम देवी या कुल देवी के रूप में हुयी. जगत जननी माँ सीता जी विवाहोपरांत अपने पितृ गृह जनकपुरी से जब  अयोध्या के लिए चलीं, तो अपनी कुल देवी जो कि  गौरी मंगला के रूप में थीं, अपने साथ ले आयीं. इसके पश्चात महाराज दशरथ जी ने अयोध्या स्थित सप्तसागर के ईशानकोण  पर एक मन्दिर बनवा दिया. लक्ष्मीस्वरूपा माता सीता जी नित्य निज निवास कनक भवन से आकर माँ  छोटी देवकाली का पूजन करती थीं.  ग्राम देवी या कुलदेवी की आराधना के फलस्वरूप ही सीता जी को उन्हें भगवान राम जैसा सुयोग्य वर मिला. उसी मान्यता की आस्था आज भी जीवित है. छोटी देवकाली के दर्शन मात्र को दूर दराज़ से नव वधुएँ यहाँ आज भी उत्साह से आती हैं और माँ का आशीर्वाद सुयोग्य वर के रूप में पाती हैं.  छोटी देवकाली मन्दिर के महत्व का उद्धरण स्कन्द पुराण और रुद्रयामल में मिलता है.  पौराणिक आख्यानों में अत्रि संहिता के मिथिला खंड में मिथिला की ग्राम देवी के रूप में उनका उल्लेख है । महर्षि वेदव्यास ने रुद्रयामल तंत्र व स्कंदपुराण में ईशानी देवी के नाम से छोटी देवकाली मंदिर का वर्णन किया है। स्कंदपुराण में ‘विदेह कुलदेवी च सर्वमंगलकारिणी श्लोक में इसका उल्लेख है। इस श्लोक में विस्तार से बताया कि इन सर्वमंगलकारिणी, स्कंदमाता, शिवप्रिया भवानी का पूजन करने से समस्त प्रकार के इष्ट पूरे होते हैं। रुद्रयामल तंत्र में श्री सीता द्वारा प्रतिदिन छोटी देवकाली मंदिर में पूजन का उल्लेख हैं। कई इतिहासकारों, दार्शनिकों और पर्यटकों ने भी इसकी महिमा का बखान अपने लेखों में किया है. यह मन्दिर फैजाबाद अयोध्या मार्ग पर हनुमान गढ़ी से आगे डाक खाने के पास गली में स्थित है.

 

 

 

 

 

 

छोटी देवकाली का महत्व

 मान्यता है कि छोटी  देवकाली की प्रतिष्ठा माता जानकी की ग्राम देवी या कुल देवी के रूप में हुयी. जगत जननी माँ सीता जी विवाहोपरांत अपने पितृ गृह जनकपुरी से जब  अयोध्या के लिए चलीं, तो अपनी कुल देवी जो कि  गौरी मंगला के रूप में थीं, अपने साथ ले आयीं. इसके पश्चात महाराज दशरथ जी ने अयोध्या स्थित सप्तसागर के ईशानकोण  पर एक मन्दिर बनवा दिया. लक्ष्मीस्वरूपा माता सीता जी नित्य निज निवास कनक भवन से आकर माँ  छोटी देवकाली का पूजन करती थीं.  ग्राम देवी या कुलदेवी की आराधना के फलस्वरूप ही सीता जी को उन्हें भगवान राम जैसा सुयोग्य वर मिला. उसी मान्यता की आस्था आज भी जीवित है. छोटी देवकाली के दर्शन मात्र को दूर दराज़ से नव वधुएँ यहाँ आज भी उत्साह से आती हैं और माँ का आशीर्वाद सुयोग्य वर के रूप में पाती हैं.  छोटी देवकाली मन्दिर के महत्व का उद्धरण स्कन्द पुराण और रुद्रयामल में मिलता है.  पौराणिक आख्यानों में अत्रि संहिता के मिथिला खंड में मिथिला की ग्राम देवी के रूप में उनका उल्लेख है । महर्षि वेदव्यास ने रुद्रयामल तंत्र व स्कंदपुराण में ईशानी देवी के नाम से छोटी देवकाली मंदिर का वर्णन किया है। स्कंदपुराण में ‘विदेह कुलदेवी च सर्वमंगलकारिणी श्लोक में इसका उल्लेख है। इस श्लोक में विस्तार से बताया कि इन सर्वमंगलकारिणी, स्कंदमाता, शिवप्रिया भवानी का पूजन करने से समस्त प्रकार के इष्ट पूरे होते हैं। रुद्रयामल तंत्र में श्री सीता द्वारा प्रतिदिन छोटी देवकाली मंदिर में पूजन का उल्लेख हैं। कई इतिहासकारों, दार्शनिकों और पर्यटकों ने भी इसकी महिमा का बखान अपने लेखों में किया है. यह मन्दिर फैजाबाद अयोध्या मार्ग पर हनुमान गढ़ी से आगे डाक खाने के पास गली में स्थित है.

 

 

 

 

 

 

छोटी देवकाली का महत्व

 मान्यता है कि छोटी  देवकाली की प्रतिष्ठा माता जानकी की ग्राम देवी या कुल देवी के रूप में हुयी. जगत जननी माँ सीता जी विवाहोपरांत अपने पितृ गृह जनकपुरी से जब  अयोध्या के लिए चलीं, तो अपनी कुल देवी जो कि  गौरी मंगला के रूप में थीं, अपने साथ ले आयीं. इसके पश्चात महाराज दशरथ जी ने अयोध्या स्थित सप्तसागर के ईशानकोण  पर एक मन्दिर बनवा दिया. लक्ष्मीस्वरूपा माता सीता जी नित्य निज निवास कनक भवन से आकर माँ  छोटी देवकाली का पूजन करती थीं.  ग्राम देवी या कुलदेवी की आराधना के फलस्वरूप ही सीता जी को उन्हें भगवान राम जैसा सुयोग्य वर मिला. उसी मान्यता की आस्था आज भी जीवित है. छोटी देवकाली के दर्शन मात्र को दूर दराज़ से नव वधुएँ यहाँ आज भी उत्साह से आती हैं और माँ का आशीर्वाद सुयोग्य वर के रूप में पाती हैं.  छोटी देवकाली मन्दिर के महत्व का उद्धरण स्कन्द पुराण और रुद्रयामल में मिलता है.  पौराणिक आख्यानों में अत्रि संहिता के मिथिला खंड में मिथिला की ग्राम देवी के रूप में उनका उल्लेख है । महर्षि वेदव्यास ने रुद्रयामल तंत्र व स्कंदपुराण में ईशानी देवी के नाम से छोटी देवकाली मंदिर का वर्णन किया है। स्कंदपुराण में ‘विदेह कुलदेवी च सर्वमंगलकारिणी श्लोक में इसका उल्लेख है। इस श्लोक में विस्तार से बताया कि इन सर्वमंगलकारिणी, स्कंदमाता, शिवप्रिया भवानी का पूजन करने से समस्त प्रकार के इष्ट पूरे होते हैं। रुद्रयामल तंत्र में श्री सीता द्वारा प्रतिदिन छोटी देवकाली मंदिर में पूजन का उल्लेख हैं। कई इतिहासकारों, दार्शनिकों और पर्यटकों ने भी इसकी महिमा का बखान अपने लेखों में किया है. यह मन्दिर फैजाबाद अयोध्या मार्ग पर हनुमान गढ़ी से आगे डाक खाने के पास गली में स्थित है.

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